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10भागवतके दस लक्षण

 भागवतके दस लक्षण 

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कामनाओं के अनुसार उपा.

 कामनाओंके अनुसार विभिन्न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्‌भक्तिके प्राधान्यका निरूपण  श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुमने मुझसे जो पूछा था कि मरते समय बुद्धिमान् मनुष्यको क्या करना चाहिये, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया ⁠।⁠।⁠१⁠।⁠। जो ब्रह्मतेजका इच्छुक हो वह बृहस्पतिकी; जिसे इन्द्रियोंकी विशेष शक्तिकी कामना हो वह इन्द्रकी और जिसे सन्तानकी लालसा हो वह प्रजापतियोंकी उपासना करे ⁠।⁠।⁠२⁠।⁠। जिसे लक्ष्मी चाहिये वह मायादेवीकी, जिसे तेज चाहिये वह अग्निकी, जिसे धन चाहिये वह वसुओंकी और जिस प्रभावशाली पुरुषको वीरताकी चाह हो उसे रुद्रोंकी उपासना करनी चाहिये ⁠।⁠।⁠३⁠।⁠। जिसे बहुत अन्नप्राप्त करनेकी इच्छा हो वह अदितिका; जिसे स्वर्गकी कामना हो वह अदितिके पुत्र देवताओंका, जिसे राज्यकी अभिलाषा हो वह विश्वेदेवोंका और जो प्रजाको अपने अनुकूल बनानेकी इच्छा रखता हो उसे साध्य देवताओंका आराधन करना चाहिये ⁠।⁠।⁠४⁠।⁠।आयुकी इच्छासे अश्विनीकुमारोंका, पुष्टिकी इच्छासे पृथ्वीका और प्रतिष्ठाकी चाह हो तो लोक-माता पृथ्वी और द्यौ (आकाश)-का सेवन करना चाहिये ⁠।⁠।⁠५⁠।⁠। सौन्दर्यकी चाहसे गन्धर्वोंकी, पत्नीकी प्राप्तिके...

सुषुम्ना मार्ग,कुंडली जागरण,

 सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीने इसी धारणाके द्वारा प्रसन्न हुए भगवान्‌से वह सृष्टिविषयक स्मृति प्राप्त की थी जो पहले प्रलयकालमें विलुप्त हो गयी थी⁠। इससे उनकी दृष्टि अमोघ और बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी तब उन्होंने इस जगत्‌को वैसे ही रचा जैसा कि यह प्रलयके पहले था ⁠।⁠।⁠१⁠।⁠। वेदोंकी वर्णनशैली ही इस प्रकारकी है कि लोगोंकी ब़ुद्धि स्वर्ग आदि निरर्थक नामोंके फेरमें फँस जाती है, जीव वहाँ सुखकी वासनामें स्वप्न-सा देखता हुआ भटकने लगता है; किंतु उन मायामय लोकोंमें कहीं भी उसे सच्चे सुखकी प्राप्ति नहीं होती ⁠।⁠।⁠२⁠।⁠। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह विविध नामवाले पदार्थोंसे उतना ही व्यवहार करे, जितना प्रयोजनीय हो⁠। अपनी बुद्धिको उनकी निस्सारताके निश्चयसे परिपूर्ण रखे और एक क्षणके लिये भी असावधान न हो⁠। यदि संसारके पदार्थ प्रारब्धवश बिना परिश्रमके यों ही मिल जायँ, तब उनके उपार्जनका परिश्रम व्यर्थ समझकर उनके लिये कोई प्रयत्न न करे ⁠।⁠।⁠३⁠।⁠। जब जमीनपर सोनेसे काम चल सकता है तब पलँगके लिये प्रयत्न करनेसे क्या प्रयोजन⁠। जब भुजाएँ अपनेको भगवान्‌की कृपासे स्वयं ही मिली हुई हैं तब तकियोंकी क...

1/19अंत समय क्या करें?

 अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम् ⁠।             पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ⁠।⁠।⁠३७              आप योगियोंके परम गुरु हैं, इसलिये मैं आपसे परम सिद्धिके स्वरूप और साधनके सम्बन्धमें प्रश्न कर रहा हूँ⁠। जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिये? ⁠।⁠।⁠३७⁠।⁠। अंत समय में क्या करें? अंत समय में वह करें जो अगले दिन करना है, भविष्य में करना है,प्रलय समाप्त होने के बाद करना है। राजा सत्यव्रत ने अंत समय में जो किया वह अगले मन्वंतर में उसको करना पड़ा। सोते वक्त व्यक्ति जो सोचता है दूसरे दिन सुबह वही विचार शुरू होते हैं,इसलिए अंत समय में वह करें जो अगले दिन अगले जन्म में करना है। राजा परीक्षित ने अंत समय में क्या किया? अथो विहायेमममुं च लोकं विमर्शितौ हेयतया पुरस्तात् ⁠। कृष्णाङ्घ्रिसेवामधिमन्यमान उपाविशत् प्रायममर्त्यनद्याम् ⁠।⁠।⁠५ या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र- कृष्णाङ्घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री ⁠। पुनाति लोकानुभयत्र सेशान् कस्तां न सेवेत मरिष्यमाणः ⁠।⁠।⁠६ इति व्यवच्छिद्य स पाण्डवेयः प्रायोपवे...